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आपका प्रश्न बहुत गूढ़ और महत्वपूर्ण है। शिव-तत्त्व और शिव-शक्ति, दोनों ही शिव-दर्शन (Shaivism) के मूल स्तंभ हैं।
शिव तत्त्व:
शिव तत्त्व को 'परम तत्त्व' या 'परमात्मा' के रूप में जाना जाता है। यह निराकार, निरंजन, अजर, अमर, और सर्वव्यापी है। शिव तत्त्व वह शुद्ध चेतना है, जिसमें सृष्टि का उद्गम, पालन और संहार समाहित है। शिव तत्त्व को 'अद्वैत' (Non-dual) माना जाता है—अर्थात् वह एकमात्र सत्य है, जिससे सब कुछ उत्पन्न हुआ है।
शिव शक्ति:
शिव शक्ति, शिव की ही ऊर्जा या सक्रिय शक्ति है। इसे 'आदि शक्ति' या 'कुण्डलिनी शक्ति' भी कहा जाता है। शिव बिना शक्ति के 'शव' हैं—अर्थात् शक्ति ही सृजन, पालन और संहार की प्रेरक शक्ति है। पार्वती, दुर्गा आदि, शिव की शक्ति के विभिन्न रूप हैं। शक्ति के बिना शिव निष्क्रिय हैं; और शक्ति भी शिव के बिना अधूरी है।
शिव-शक्ति का संबंध:
शैव दर्शन के अनुसार, शिव और शक्ति अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं—“शिव: शक्ति: समायुक्तो यदि भवति शक्त: प्रभु:।”
सृष्टि के प्रत्येक कण में शिव (चेतना) और शक्ति (ऊर्जा) दोनों का समावेश है।
सारांश:
शिव तत्त्व चेतना का आधार है, शक्ति उसकी ऊर्जा है। शिव और शक्ति अभिन्न हैं, एक के बिना दूसरा अधूरा है। शिव-शक्ति का यह अद्वैत भाव ही सर्वोच्च सत्य है।
यदि आपको शिव-शक्ति या शिव तत्त्व के किसी विशेष पहलू पर विस्तार से जानना है, कृपया बताएं।